मेरी शिकायत
ये सब क्या बकवास है ??????
ये उत्साह देने वाले व जीवन को नयी दिशाएं देने वाले प्रेरक वाक्य या नकारात्मक सोच व डर से प्रेरित व्यक्तियों के सम्बोधन , छात्रों को माननीय श्री पंकज श्रीवास्तव जी के द्वारा दिए गए भाषण व सुझाव 'मेरी शिकायत' के जन्म का कारण बना । माननीय , लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में पत्रकारिता विभाग द्वारा कार्यक्रम आयोजित किया गया था इस संवाद कार्यक्रम में अतिथि जी द्वारा छात्रों को उनके सवालो के जवाब दिए गए इसमें उन्होंने कहा कि आप सभी छात्र इस पत्रकारिता व कॉर्पोरेट के क्षेत्र में ना आएं , किसी अन्य क्षेत्र में भविष्य बनाये ,यहाँ पे सब जगह भ्रष्टाचार है, आपकी कोई जगह यहाँ नहीं है । इसी सन्दर्भ में मेरी विभाग से एक छात्र के रूप में अनुरोध है कि मेरी शिकायत का निवारण कराया जाए ।
मैं एक संघर्षरत छात्र हुँ , जो अपने अत्यधिक परिश्रम से स्वयं धनोपार्जन करके उज्जवल भविष्य बनाने हेतु शिक्षा ग्रहण कर रहा हुँ । इस कार्यक्रम में अच्छे अनुभव , भविष्य कि उज्जवल कामना , सकरात्मक सहयोगी ज्ञान हेतु आया था , परन्तु महोदय द्वारा दिए गए नकारात्मक सन्देश से हम अपने को छले गए व हताशा की अवस्था में पहुँचना महसूस कर रहे है और सोच रहे हैं कि अब हम क्या करे व भविष्य अंधकारमय दिखने लगा है । विभाग द्वारा समय-२ पे उच्च प्रतिष्ठित ज्ञानी व अनुभवी व्यक्तियों को ही बुलाया जाए जो सकरात्मक दिशा, सोच से हमे अपने भविष्य को उज्जवल बनाने हेतु प्रेरित करे , भ्रष्टाचार को ही समस्या ना मान के उससे कैसे लड़े यह समझाएं क्यूंकि हम जानते हैं व मानते हैं कि बिना गन्दगी में उतरे , गन्दगी साफ़ नहीं हो सकती।
हम बहुत ही सामान्य परिवारों के निकले हुए विद्यार्थी हैं , जहाँ घर से ही कहा जाता है कि दिल्ली बहुत दूर हैं , अर्थात हम नकारात्मक सोच के साथ ही संघर्ष करते हुए घरों से विश्वविद्यालय उमंगो व उत्साह के साथ जीवन के संघर्ष पथ पे आ गए हैं । अतः हहमे ऐसा सकरात्मक ज्ञान व शिक्षा दी जाए जिससे भविष्य में नौकरी के क्षेत्र में आ करके हम भी समाज में अपना सहयोग करें तथा उज्जवल भारत , स्वच्छ भारत, शिक्षित भारत, स्वस्थ भारत की कामना इन सकरात्मक पंक्तियों के साथ कर सकें ।
" देख कर बाधाएं विविध बहु विघ्न घबराते नहीं ,
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं ।
हैं ऐसा काम कौन सा जो ना उनसे किएँ ,
वे नमूना बन जाते हैं अपने आप औरों के लियें ॥"
ये सब क्या बकवास है ??????
कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं , जीता वही जो डरा नहीं ।
वो पथ क्या पथिक परीक्षा क्या जिस पथ में बिखरे शूल ना हो ,
नाविक के धैर्य की परीक्षा क्या जब धाराए प्रतिकूल ना हो ॥
ये उत्साह देने वाले व जीवन को नयी दिशाएं देने वाले प्रेरक वाक्य या नकारात्मक सोच व डर से प्रेरित व्यक्तियों के सम्बोधन , छात्रों को माननीय श्री पंकज श्रीवास्तव जी के द्वारा दिए गए भाषण व सुझाव 'मेरी शिकायत' के जन्म का कारण बना । माननीय , लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में पत्रकारिता विभाग द्वारा कार्यक्रम आयोजित किया गया था इस संवाद कार्यक्रम में अतिथि जी द्वारा छात्रों को उनके सवालो के जवाब दिए गए इसमें उन्होंने कहा कि आप सभी छात्र इस पत्रकारिता व कॉर्पोरेट के क्षेत्र में ना आएं , किसी अन्य क्षेत्र में भविष्य बनाये ,यहाँ पे सब जगह भ्रष्टाचार है, आपकी कोई जगह यहाँ नहीं है । इसी सन्दर्भ में मेरी विभाग से एक छात्र के रूप में अनुरोध है कि मेरी शिकायत का निवारण कराया जाए ।
मैं एक संघर्षरत छात्र हुँ , जो अपने अत्यधिक परिश्रम से स्वयं धनोपार्जन करके उज्जवल भविष्य बनाने हेतु शिक्षा ग्रहण कर रहा हुँ । इस कार्यक्रम में अच्छे अनुभव , भविष्य कि उज्जवल कामना , सकरात्मक सहयोगी ज्ञान हेतु आया था , परन्तु महोदय द्वारा दिए गए नकारात्मक सन्देश से हम अपने को छले गए व हताशा की अवस्था में पहुँचना महसूस कर रहे है और सोच रहे हैं कि अब हम क्या करे व भविष्य अंधकारमय दिखने लगा है । विभाग द्वारा समय-२ पे उच्च प्रतिष्ठित ज्ञानी व अनुभवी व्यक्तियों को ही बुलाया जाए जो सकरात्मक दिशा, सोच से हमे अपने भविष्य को उज्जवल बनाने हेतु प्रेरित करे , भ्रष्टाचार को ही समस्या ना मान के उससे कैसे लड़े यह समझाएं क्यूंकि हम जानते हैं व मानते हैं कि बिना गन्दगी में उतरे , गन्दगी साफ़ नहीं हो सकती।
हम बहुत ही सामान्य परिवारों के निकले हुए विद्यार्थी हैं , जहाँ घर से ही कहा जाता है कि दिल्ली बहुत दूर हैं , अर्थात हम नकारात्मक सोच के साथ ही संघर्ष करते हुए घरों से विश्वविद्यालय उमंगो व उत्साह के साथ जीवन के संघर्ष पथ पे आ गए हैं । अतः हहमे ऐसा सकरात्मक ज्ञान व शिक्षा दी जाए जिससे भविष्य में नौकरी के क्षेत्र में आ करके हम भी समाज में अपना सहयोग करें तथा उज्जवल भारत , स्वच्छ भारत, शिक्षित भारत, स्वस्थ भारत की कामना इन सकरात्मक पंक्तियों के साथ कर सकें ।
" देख कर बाधाएं विविध बहु विघ्न घबराते नहीं ,
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं ।
हैं ऐसा काम कौन सा जो ना उनसे किएँ ,
वे नमूना बन जाते हैं अपने आप औरों के लियें ॥"