Sunday, May 10, 2015

ऊँगली

ऊँगली ! जी हाँ मेरे जीवन में ऊँगली। आज कुछ पुरानी यादों के बीच ऊँगली भी याद आ गई , छोटी सी ऊँगली लेकिन सोच रहा हूँ की ये छोटी तो है नहीं। अपने में पूरा जीवन दर्शन समेट रही , चलो पुरानी यादें ताज़ा करते हैँ|
 वो बचपन के दिन जीवन के पहला कदम,माँ की ऊँगली का सहारा माँ की आस् हमारा पहला कदम, पिता की अत्यंत ख़ुशी | ऊँगली के साथ जीवन शुरू होने का पहला कदम। कोई डर नहीं किसी का डर नहीं क्यों ? माँ पिता के हाँथो का मजबूत सहारा हमारी ऊँगली को का कस के पकड़ रखा है गिरने न देगा। ऊँगली फिर तैयार है स्कूल का पहला कदम आँखों मेस्कू  में स्कूल न जाने के आंसू पर माँ ने ऊँगली पकड़ ली, गुब्बारे व् टॉफी के साथ | ऊँगली को माँ छूटने ही नहीं देती।
          समय तो बढ़ता ही गया अब हम बड़े और सामाजिक बालिग हो गए है । हर तरफ शोर , ख़ुशी का आलम, पिता का गर्व से भरा चेहरा , माँ की आँखों की चमक के बीच हमारी ऊँगली इतरा रही है | सबकी आँखे हमारी ऊँगली को देख रही हैँ। मंगल गीतों के बीच ऊँगली में एक अँगूठी का प्रवेश और हम पर जिम्मेदारी के साथ आज़ादी की यादो  के बीच सगाई होने की ख़ुशी| ऊँगली आज के मेरे सबसे बड़े ख़ुशी के दिन मेरे सबसे पास है।
            आज याद आ रही है बहुत सी भूली बिसरी यादें। हॉस्पिटल में समय की करवट, पिता जी की ऊँगली मेरेहाथ में थी। मजबूती के साथ । सारे समय अनजाना सा डर की ऊँगली छुट न जाये और वह गिर न पड़े । पिता का वो बचपन में हमारे हाथ की ऊँगली मजबूती से क्यों पकड़ना अब समय ने हमको बतलाया । लेकिन ये क्या ! उनकी उँगलियों ने मेरी ऊँगली क्यों छोड़ दी, पापा उठ क्यों नहीं रहें।             पंडित जी कह रहे हैँ की ऊँगली को आगे करके तर्पन करे व् मृतक की आत्मा की शांति के लिए हाथ जोड़े। आज फिर हमारे साथ, व् हाथ में ऊँगली है हमारी छोटी सी बिटिया की ऊँगली , ऊँगली के बीच में मेरी कलम और आज भी मेरी प्यारी सबसे सच्ची दोस्त उंगलिया हमारे आँसुओं को बीच बीच में पोछ रही हैं||

Saturday, May 9, 2015

बिटिया

आज फिर आँखे भर आई है, दिल रो रहा है
न जाने किसकी याद आई है, आज फिर आँखे भर आई है

याद आई है वो माँ की ममता शायद
      या फिर पिता का प्यार
जो छूट गया है बहुत पीछे
       जब से बजी शहनाइ है
आज फिर आँखे भर आई है

उम्र के हसीन वर्ष बिताये जिनके साथ
     साथ साथ हँसना साथ साथ रोना
साथ साथ खाना साथ साथ सोना
फिर अब क्यों बेटी पराई है

हर बेटी की यही व्यथा है
     उसको मिलती क्यों ये सजा है
अपनों को छोड़कर परायो के बीच
       क्या कभी उसकी जगह बन पाई है
आज फिर आँखे भर आई है

वो पिता जो उसका अपना था
       क्या वो सब बस एक सपना था
माँ जो देखती थी उसका रास्ता
       आज फिर नहीं देती दिखाई है
आज फिर आँखे भर आई है

पिता का घर उसका था या फिर
      पति का घर उसका अपना है
इस ही कश्मकश में हर औरत
       ने जिंदगी अपनी सदा बिताई है


काश मुझे फिर वही  दिन मिले जीने में
      कसक जिनकी आज भी है मेरे सीने में
मिल भी गए तो फिर वो बात न रहेगी उनमे
        क्योंकि मेरी जगह किसी और ने पाई है
आज फिर आँखे भर आई है |